Tuesday, May 25, 2010

धोये गये हम ऐसे कि बस पाक हो गये





तुम्हारी
अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जाते ?

जो बाबस्ता हुए तुमसे वो अफ़साने कहाँ जाते ?


क़तील शिफ़ाई



वारस्ता इससे है कि महब्बत ही क्यों हो

कीजे हमारे साथ अदावत ही क्यों हो


ग़ालिब




रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गये

धोये गये हम ऐसे कि बस पाक हो गये


ग़ालिब




21 comments:

  1. shukria .
    aur sher bhi arz karne ki darkwast hai janaab .

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  2. इस अमल का नाम है - वस्ल ए माशूक़ बशक्ल ए माकूस ।

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  3. ब्लागर की तक़दीर ज़माने से उलट होती है ।
    जगता है ब्लागर जब दुनिया सोती है ॥
    हक ए माशूक़ यूँ अदा करता है दिन में ही ।
    ताकता है ऊपर कि ज़मीं आसमान होती है ॥
    http://chhotibat.blogspot.com/2010/07/blog-post_06.html?showComment=1278438770919#c316808109777606756

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  4. kyunki is vishay par apka achcha adhikar hai isliye ye sher apko saunpta hun . aap aaye meri post padhi aur saraahi , shukriya .

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  5. वारस्ता इससे है कि महब्बत ही क्यों न हो

    कीजे हमारे साथ अदावत ही क्यों न हो

    Badhiya chune hue sher padhwaye hainAlbela ji aapne. Shukriya.

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  6. कम्माल के शेर है!... वाह!

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  7. Bhai Ji ,aapka utsah vardhan bahut badi niyamat hai ,bahut utsah milta hai is sey /apna sneh banaye rakhiye ,bahut accha laga aapka aana ,abhaar,dhanyavaad.
    sader,
    dr.bhoopendra
    jeevansandarbh.blogspot.com

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  8. प्रिय भूपेन्द्र जी !

    आपने अच्छा लिखा, संयोग से मैंने पढ़ा....और मुझे बहुत अच्छा लगा ..........

    आपको बेहतरीन लेखन के लिए दिली बधाई !

    मिलते रहेंगे.............

    -अलबेला खत्री

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  9. बहुत चुन कर शेर लाये हैं ...बहुत खूब ..

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  10. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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  11. Thanks sir aapki hausala afzai ke liye.aap jaise big brothers hi marg dikhate hai ,dikhatey rahiye bhi/hardik dhanyavaad.
    sader
    dr.bhoopendra
    jeevansandarbh.blogspot.com

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  12. आपका बहुत बहुत धन्यवाद ये शेर मुझे भी बहुत पसंद है ! एक बार मेरा भी ब्लॉग देख लीजिये

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  13. bahut sundar sher prastut kiye aapne. aanand aa gaya .
    aabhar.

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  14. रोने से और इश्क में बेबाक होगये ,
    धोये गए ऐसे कि बस पाक हो गए .

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  15. आपको हरियाली अमावस्या की ढेर सारी बधाइयाँ एवं शुभकामनाएं .

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  16. गालिब से रुबरू करवाने के लिये धन्यवाद!

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